ऋषिकेश- एम्स मे होगा नशे के आदी मरीजो का समूचित उपचार
त्रिवेणी न्यूज 24 ऋषिकेश – नशे की बीमारी ने समाज में आज लगभग सभी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। बढ़ता तनाव, शहरीकरण, बेरोजगारी, युवाओं में जोखिम लेने वाले व्यवहार का बढ़ना, घरेलू कारण अथवा साथियों का दबाव ऐसे बहुत से कारण इस सबकी मुख्य वजह हो सकते हैं। मगर यहां यह स्पष्ट करना जरुरी है कि नशा करते रहना एक प्रवृत्ति नहीं बल्कि एक बायोलॉजिकल ब्रेन डिसऑर्डर है। जिसमें व्यक्ति के दिमाग में कई अस्थायी व स्थायी बदलाव आते हैं तथा इस रोग से छुटकारा पाने के लिए उपचार की नितांत जरुरत पड़ती है। नशे के रोग को इलाज (दवाओं और स्टरक्चरड काउंसलिंग) की मदद से ठीक किया जा सकता है। उत्तराखंड राज्य में सबसे अधिक किए जाने वाले नशों में शराब, कैनाबिस (गांजा, भांग आदि) अथवा ओपियाइड्स का नशा मुख्य है। नशे का समग्र उपचार मरीज को नशा मुक्ति केंद्रों में दाखिल कर या अस्पताल की ओपीडी के स्तर पर किया जाता है। देखा गया है कि वर्तमान में उपलब्ध संसाधनों मसलन बेहतर दवाओं और काउंसलिंग सुविधाओं के माध्यम से ज्यादातर मरीजों को नशा मुक्ति केंद्र/अस्पतालों में दाखिले की जरूरत नहीं पड़ती। एम्स निदेशक प्रोफेसर डॉ रवि कांत ने बताया कि एम्स में MOSJ&E के सहयोग से तथा NDDTC, एम्स, दिल्ली की निगरानी में एडिक्शन ट्रीटमेंट फैसिलिटी (ATF) संचालित की जा रही है, जो नशे के रोगियों का उच्चस्तरीय इलाज निशुल्क प्रदान कर रही है। लिहाजा इस तरह के रोगों से ग्रसित मरीजों को समय रहते इस सुविधा का लाभ लेना चाहिए व अपने जीवन का संरक्षण करना चाहिए। ऐसा करने से वह अपनी खोई हुई सेहत व सामाजिक प्रतिष्ठा को भी फिर से पा सकते हैं और समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकते हैं। उनका कहना है कि इस दिशा में नशे के आदी मरीज के पारिवारिकजनों, रिश्तेदारों, मित्रों व परिचितों को पहल करने की आवश्यकता है उन्हें ऐसे मामलों में अपने प्रियजनों को लेकर गंभीरता से विचार करना चाहिए। एम्स ऋषिकेश में इन रोगियों का इलाज पूरी तरह से मानवीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुए किया जाता है। क्योंकि नशे की बीमारी दिमाग़ में बदलाव के कारण होती है इसलिए दवाओं के बिना इलाज पूरा नहीं हो पाता है. मनोरोग विभाग के एडिशनल प्रोफेसर व (एटीएफ) के नोडल ऑफिसर डॉ. विशाल धीमान ने बताया कि नशे की बीमारी एक मानसिक रोग है, मेंटल हेल्थकेयर एक्ट ( MHCA) 2017, के अनुरूप हर नशा मुक्ति केंद्र को ‘मेंटल हेल्थ establishment’ ( MHE) के तौर पर रजिस्टर होना अनिवार्य है, जहां इस कानून के अनुरूप मरीज को पंजीकृत किया जाएगा। मेंटल हेल्थ केयर एक्ट (MHCA) 2017 के मुताबिक नशा मुक्ति केंद्रों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके पास सुचारु सुविधाओं और इलाज के लिए पर्याप्त जगह, बिस्तर, दवाएं,डॉक्टर, नर्स, काउंसलर आदि उपलब्ध हैं अथवा नहीं, यह सुनिश्चित होने की स्थिति में ही यह मेंटल हेल्थ establisment की तरह कार्य कर सकते हैं। स्टेट मेंटल हेल्थ अथॉरिटी( SMHA), उत्तराखंड द्वारा सभी नशा मुक्ति केंद्रों का विनियमन किया जाना है तथा पंजीकरण होगा। विभाग की काउंसलर तेजस्वी कंडारी व नर्स एकता चौहान द्वारा बताया गया कि नशे के रोगी सही दवाओं और इलाज से एक अच्छे व ऑथराइज्ड/रजिस्टर्ड मेंटल हेल्थ establishment में ही अपना उपचार कराएं।
