ऋषिकेश- शादियों में पारंपरिक मांगल गीत गाकर पहाड़ी संस्कृति को जीवंत करने का प्रयास कर रही महिलाएं
त्रिवेणी न्यूज 24
ऋषिकेश – ढालवाला 14 बीघा की महिलाएं शादी समारोह में पारंपरिक मांगल गीत गाकर पहाड़ी संस्कृति को संजोने का काम कर रही है ।
आचार्य संतोष व्यास ने कहा कि
देवभूमि उत्तराखंड हिमालय प्राचीन काल से ही संस्कृत संस्कृति और संस्कारों का उद्गम स्थल रहा हैं। यहां पर ऋषि परम्पराओं से निसृत 16 संस्कारों से समस्त भारतवर्ष और विश्व में निश्चित रूप से मानवता का विकास हुआ है । बहुत लंबे समय से विदेशी आक्रांताओं, आक्रमणकरियों द्वारा इन संस्कारों पर सांस्कृतिक राजनैतिक और सामाजिक आघात के कारण लोग अपनी संस्कृति और संस्कारों से विरत हो राह भटकने लगे थे परिणाम स्वरूप प्राकृतिक और पर्यावरण असंतुलन, महामारी, और मानवता का ह्रास होने लगा है।
यह बहुत अच्छी बात है कि अब लोग जागरूक हो रहें हैं, हमारी संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत, तीज-त्योहार,और बोली भाषा, रीति-रिवाज के प्रति यह जागरूकता निश्चय ही दूरगामी और सकारात्मक परिणाम देगी। जागरूकता के फलस्वरूप लोग शनै-शनै अपने घर, गांव और सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश में लौटने की कोशिश कर रहें हैं।
ढालवाला में वैवाहिक कार्यकम पूर्व मेहंदी में मांगल लगाने की परंपरा को देखकर हृदय गदगद हुआ। ढालवाला की समाज सेविका निर्मला उनियाल व उनकी सहयोगी मीना मदवान, शोभा वर्थवाल, शशि कंडारी
इस संस्कृति को संजोने का प्रयास कर रही हैं। उनके द्वारा मांगलिक गीतों से जहां देवभूमि की संस्कृति का पुनरोत्थान हो रहा है वहीं षोडश संस्कारों में सबसे महत्वपूर्ण पाणिग्रहण संस्कार में मंगल गान जीवन को नया संगीत और स्वर देता है। निर्मला उनियाल संस्कृति के क्षेत्र में अहम भूमिका निभाती हैं । इनके द्वारा गढ़भूमि लोक संस्कृति संरक्षण समिति उत्तराखंड द्वारा किए जाने वाले गढ़ महोत्सव में संस्कृति संरक्षण हेतु बहुत सराहनीय कार्य किए गए। गढ़भूमि लोक संस्कृति संरक्षण समिति के अध्यक्ष आशाराम व्यास, डॉ. सुनील थपलियाल, विशालमणी पैन्यूली सहित समिति के सभी व्यक्तियों ने मातृ -शक्ति द्वारा देवभूमि की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए जो कार्य किया जा रहा है अत्यंत सराहनीय है जो कि निकट भविष्य में संस्कृति संरक्षण संवर्धन हेतु मील का पत्थर साबित होगा ।
