कामरेड कमरुद्दीन की याद में गरिमामय श्रद्धांजलि सभा
देहरादून, 4 अगस्त। सभावाला गाँव का वातावरण आज गंभीर, भावुक और क्रांतिकारी संकल्प से ओत-प्रोत था। अखिल भारतीय किसान सभा के वरिष्ठ नेता, राष्ट्रीय काउंसिल सदस्य, उत्तराखंड किसान सभा के पूर्व अध्यक्ष एवं संस्थापक सदस्यों में से एक कामरेड कमरुद्दीन की स्मृति में एक भव्य श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन किया गया। किसान उत्तराखण्ड द्वारा आयोजित इस सभा में प्रदेश भर से जुटे कार्यकर्ताओं, राजनीतिक दलों के नेताओं, पारिवारिक जनों और ग्रामवासियों ने उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की।
सुबह से ही गाँव के नफीस इंटर कॉलेज का परिसर श्रद्धांजलि देने वालों से पटा हुआ था। कामरेड कमरुद्दीन के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने वालों की कतार लगी रही। कार्यक्रम की शुरुआत उनके जीवन के संघर्षमय पहलुओं को दर्शाते हुए कामरेड शिवप्रसाद देवली अध्यक्ष किसान सभा उतराखण्ड एवं किसान नेता कामरेड राजेंद्र पुरोहित ने विचार रखे। उन्होंने जेल-यात्राओं, आंदोलनों और उनकी मधुर मुस्कान के क्षणों को संजोया, जिससे पूरा माहौल नम आँखों और दृढ़ इरादों का संगम बन गया।
एक साधारण किसान परिवार से लोकप्रिय नेता तक का सफर कामरेड कमरुद्दीन ने अपना जीवन एक साधारण किसान परिवार में शुरू किया, लेकिन अपनी अदम्य लगन, संघर्षशीलता और जनता के प्रति अटूट समर्पण के बल पर वे क्षेत्र के लोकप्रिय नेता बने। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन किसानों, मजदूरों और मेहनतकश जनता के अधिकारों की लड़ाई के लिए समर्पित कर दिया। जेल- यात्राएँ और आंदोलन
कामरेड कमरुद्दीन कई बार जनता के सवालों पर जेल गए। चाहे मुआवज़ा आंदोलन हो, भू-अधिकार कानून हो, महंगाई के खिलाफ जनरैली हो, हर मोर्चे पर वे आम जनता के साथ खड़े रहे। उनकी अडिगता और नीतियों से कभी समझौता न करने वाला स्वभाव उन्हें अलग करता था। भूमाफियाओं से लड़ते हुए उन्होंने गरीबों की जमीन छुड़वाई। उनके इस संघर्ष के कारण ही भूमाफियाओं ने उन पर दर्जनों झूठे मुकदमे लगाए, लेकिन कामरेड कमरुद्दीन कभी पीछे नहीं हटे।
उनके संघर्ष के कारण ही वे सभावाला के प्रधान बने, भारी बहुमत से जिला पंचायत सदस्य चुने गए, तथा अपनी मृत्यु से पूर्व वे क्षेत्र पंचायत सदस्य रहे। उन्होंने हर पद पर रहते हुए जनता के हितों को सर्वोपरि रखा। उन्होंने बचपन से लेकर अंतिम साँस तक हर पल किसानों, खेतिहर मजदूरों और शोषितों के हक़ की लड़ाई में गुज़ारा। उनकी सादगी, अडिगता और नीतियों से कभी समझौता न करने वाला स्वभाव उन्हें अलग करता था। किसान आंदोलन ने आज एक निडर, ईमानदार और अथक सैनिक को खो दिया है।” कामरेड कमरुद्दीन ने 1990 के दशक में उत्तराखंड आंदोलन के दौरान भी किसानों के मुद्दों को अलग से उठाकर एक अलग पहचान बनाई थी। उन्होंने सभावाला गाँव को संगठन का केंद्र बनाया और युवाओं को राजनीतिक जागरूकता से जोड़ा।अन्य वक्ताओं ने कहा
संयुक्त किसान मोर्चा के नेता ताजिंदर सिंह, कांग्रेस नेता गुलजार अहमद, समाजवादी पार्टी के पूर्व उपाध्यक्ष हुसैन अहमद तथा विभिन्न दलों और जनप्रतिनिधियों ने भी अपनी भावनाएँ साझा कीं। सभी ने एक स्वर में कहा कि उनके अधूरे सपनों और संघर्षों को आगे बढ़ाना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
परिवार का संदेश
कामरेड कमरुद्दीन के पुत्र नफीस और पुत्री नूर निशा भी सभा में उपस्थित रहे। दोनों संतानों ने सभी आयोजकों और शुभचिंतकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा की
“पिता जी हमेशा कहते थे कि इंसान अपनी उम्र से नहीं, अपनी कर्मभूमि से बड़ा होता है। उन्होंने पूरी ज़िंदगी समाज के अंतिम पायदान पर खड़े इंसानों के लिए जीयी। उनकी याद हमारे लिए प्रेरणा है, उनके अधूरे सपनों को पूरा करना हमारी ज़िम्मेदारी होगी।” कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित लोगों ने दो मिनट का मौन रखकर आत्मा को शांति दी।
सभी ने यह संकल्प दोहराया कि जिन मुद्दों के लिए वे लड़े—भूमि अधिकार, न्यायसंगत मुआवज़ा, खेती बचाओ, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार उन्हें और मज़बूती से उठाया जाएगा।
